श्रावण- संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा

गणेशजी ने कहा-“हे अचलसुते! अत्यंत पुण्यकारी एवं समस्त कष्टनाशक व्रत को किजिए ।इसके करने से आपकी सभी आकांक्षाएँ पूर्ण होंगी और जो व्यक्ति इस व्रतको करेंगे उन्हें भी सफलता मिलेगी।”
हे देवाधिदेवेश्वरी! श्रावण के क्र्ष्ण चतुर्थी की रात्रि में चंद्रोदय होने पर पूजन करना चाहिए। उस दिन प्रात:कृत्य से निबटकर मन में संकल्प करें कि ‘जब तक चन्द्रोदय नहीं होगा, मैं निराहार रहूँगा/ रहूँगी ।
पहले गणेश पूजन करके तभी भोजन ग्रहण करूगी/ करूँगा।’ मन में ऐसा निश्चय करना चाहिए। इसके बाद सफेद तिल के जल से स्नान करें।
अपना नित्य कर्म करने के बाद हे सुंदर व्रत वाली! मेरा पूजन करें। यदि सामर्थ्य हो तो प्रतिमास स्वर्ण की मूर्ति का पूजन करें ( अथवा चांदी, अष्ट धातुया मिट्टी की मूर्ति की पूजा करें) ।
अपनी शक्ति के अनुसार सोने,चांदी,ताम्बे अथवा मिट्टी के कलश में जल भरकर उस पर गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करें। कलश पर वस्त्राच्छादन करके अष्टदल कमल की आकृति बनावें और उस पर मूर्ति की स्थापना करें।तत्पश्चात षोडशोपचार विधि से भक्ति पूर्वक पूजन करें।
मूर्ति का ध्यान निम्न प्रकार से करें- हे लम्बोदर! चार भुजा वाले! तीन नीत्र वाले! लाल रंग वाले! हे नील वर्ण वाल! शोभा के भण्डार! प्रसन्न मुख वाले गणेश जी! मैं आपकाध्यान करता/करती हूँ । मैं आपका आवाहन करता हूँ। हे विघ्नराज ! मैं आपको प्रणाम करता हूँ, यह आसन है। हे लम्बोदर! यह आपके लिये पाद्य है, हे शंकरसुवन!यह आपके लिये अर्घ्य है।
हे उमापुत्र! यह आपके स्नानार्थ जल है। हे वक्रतुण्ड! यह आपके लिए आचमनीय जल है। हे शूर्पकर्ण! यह आपके लिए वस्त्र है। हे कुब्जे! यह आपके लिए यज्ञोपवेत है । हे गणेश्वर! यह आपके लिए रोली, चंदन है। हे विघ्नविनाशन! यह आपके लिए फूल है। हे विकट! यह आपके लिए धूपबत्ती है। हे वामन! यह आपके लिए दीपक है। हे सर्वदेव! यह आपके लिए लड्डु का नैवेद्य है। हे सर्वार्त्तिनाशन देव! यह आपके निमित्त फल है। हे विघ्नहर्ता! यह आपके निमित्त मेरा प्रणाम है। प्रणाम करने के बाद क्षमा प्रार्थना करें।

इस प्रकार षोडशोपचार रीति से पूजन करके नाना प्रकारके भक्ष्य पदार्थों को बनाकर भगवान को भोग लगावें। हे देवी! शुद्ध देशी घी में पंद्रह लड्डु बनावें। सर्वप्रथम भगवान को लड्डु अर्पित करके उसमें से पाँच ब्राह्मण को दे दें। अपनी सामर्थ्यानुसर दक्षिणा देकर चन्द्रोदय होने पर भक्तिभाव से अर्घ्य देवें। तदंतर पाँच लड्डु का स्वयं भोजन करें।
पहले चतुर्थी को अर्घ्य देते हुये निम्न प्रकार से प्रार्थना करें- “हे देवी! तुम सब तिथियों में सर्वोत्तम हो, गणेश जी की परम प्रियतमा हो। हे चतुर्थी हमारे प्रदत्त अर्घ्य को ग्रहण करो, तुम्हें प्रणाम है।” इसके बाद चंद्रमा को अर्घ्य प्रदान करें - “क्षीरसागर से उत्पन्न हे लक्ष्मी के भाई! हे निशाकर! रोहिणी सहित हे शशि! मेरे दिये हुये अर्घ्य को ग्रहण किजिये।”
तत्पश्चात, गणेश जी को प्रणाम करते हुये निम्न प्रकार से कहें- “हे लम्बोदर! आप सम्पूर्ण इच्छाओं को पूर्ण करनेवाले हैं आपको प्रणाम है । हे समस्त विघ्नों के नाशक! आप मेरी अभिलाषाओं को पूर्ण करें।” तत्पश्चात ब्राह्मण को हाथ जोड़कर प्रार्थना करें-“ हे द्वीजराज! आपको नमस्कार है, आप साक्षात देवस्वरूप है। गणेशजी की प्रसन्नता के लिए हम आपको लड्डु समर्पीत कर रहे हैं। आप हम दोनों का उद्धार करने के लिए दक्षिणा सहित इन पाँच लड्डुओं को स्वीकार करें। हम आपको नमस्कार करते हैं।” इसके बाद ब्राह्मण भोजन काराकर गणेश जी से प्रार्थना करें।
प्रार्थना करके मूर्ति का विसर्जन कर दें और अपने गुरु को अन्न-वस्त्रादि एवं दक्षिणा के साथ मूर्ति दे देवें। इस प्रकार से विसर्जन करें- ‘हे देवों में श्रेष्ठ! गणेश जी! आप अपने स्थान को प्रस्थान किजिए एवं इस व्रत पूजा के फल को दिजिए।’
इस प्रकार व्रत करके, बाद में स्वयं भोजन करें।
श्रीकृष्ण जी कहते हैं कि हे युधिष्ठिर! प्राचीन काल में स्वयं गणेशजी ने पार्वतीजी से कहा था और पार्वती जी ने उसी भाँति आराधना के थी, जिससे उन्हें सफलता प्राप्त हुई। इसी व्रत के करने से पतिव्रता पार्वती जी का विवाह शिव जी से हुआ। अत: हे महाराज युधिष्ठिर! आप भी इस संकटनाशक व्रत को करें। यह बहुत शुभकारी है।
स्कंदकुमार जी कहते हैं कि श्रीकृष्ण जी के मुख से इस प्रकार संकटनाशक चतुर्थी व्रत सुनकर हे महर्षि! पूर्वकाल में राज्य की प्राप्ति कामना से युधिष्ठिर ने इस व्रत को किया। इस व्रत के प्रभाव से उन्होंने सम्पूर्ण शत्रुओं का विनाशकरके राज्य प्राप्त किया।
इस व्रत को करने से मनुष्य की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। मनुष्य, किसी प्रकार का संकट आने पर इस व्रत को करने से संकट मुक्त हो जाता है। यह विद्यार्थियों को विद्या तथा धनेच्छु को धन की प्राप्ति करवाता है। संतान की इच्छा करने वाले को संतान प्राप्ति, रोगग्रस्त को व्याधिमुक्त करता है।