पापमोचनी एकादशी व्रत कथा प्रारम्भ (Page 3/4)

अप्सरा ने कहा- “विप्रवर ! अबतक न जाने कितनी संध्या चली गयी। मुझपर कृपा करके बीते हुए समय का विचार तो किजिये। ”
लोमशजी कहते हैं- “राजन ! अप्सरा की बात सुनकर मेधावी के नेत्र आश्चर्य से चकित हो उठे। उस समय उन्होंने बीते हुए समय का हिसाब लगाया तो मालूम हुआ कि उसके साथ रहते सत्तावन वर्ष हो गये। उसे अपनी तपस्या का विनाश करनेवाली जानकर मुनि को उसपर बड़ा क्रोध हुआ।
उन्होंने शाप देते हुए कहा- “पापिनी ! तू पिशाच हो जा।” मुनि के शाप से दग्ध होकर वह विनय से नतमस्तक हो बोली- “विप्रवर! मेरे शाप का उद्धार किजिये। सात वाक्य बोलने या सात पद साथ-साथ चलने मात्र से ही सत्पुरुषों के साथ मैत्री हो जाती है।
ब्रह्मन ! मैंने तो आपके साथ अनेक वर्ष व्यतीत किये हैं; अत: स्वामिन! मुझपर कृपा किजिये। ”
मुनि बोले- “भद्रे ! मेरी बात सुनो- यह शाप से उद्धार करनेवाली है। क्या करूँ। तुमने मेरी बहुत बड़ी तपस्या नष्ट कर डाली है। चैत्र कृष्ण पक्ष में एकादशी आती है उसका नाम है ‘पापमोचनी’। वह सब पापों का क्षय करनेवाली है। सुंदरी ! उसी का व्रत करने पर तुम्हारी पिशाचता दूर होगी।”